होलीका संवाद-गीतः

 

होलीका संवाद-गीत

सोलहा सालकी सांवरी छोरी, मासुम ऑर थी भोली।
गांवकी सूरत, नटखट मूरत, ऊठ सवेरे बोली ।

“ आई होली रंगो भरकर, देखो सूरजकी किरने,
सोने जैसी हवामें हलचल, आओ खेले होली ।“

   एक बांका छोरा बोला करके आंखमिचोली।
“ हां, नीकला इन्द्रधनु अंबर पे, चलो खेले होली ।“

 “ अरे जा,जा, पहले बता तू रंग पवनका
फिर बता रंग खुश्बूका, तब खेलेंगे होली।“

गहरी सोचमें पड गया छोरा, ये उल्झन कहांसे मोली?
खुश्बू ओर पवनका रंग, ये तो मुश्किल हो गई पहली।
सोच सोचकर पाया आखिर, कहां है ऐसा रंग कहीं भी,
बीजली-सा कुछ चमक उठा, गया गुलाली आंखे खोली।

बोला,”एक मैं जानु गहरा रंग जो जगमें सबसे ऊंचा।
अगर मिला दे रंग जो तेरा, तो प्रेमसे खेले होली।
पवन तो क्या, खुश्बु तो क्या, लिख दूं पानी पर भी नाम,
बस, सच्चा रंग तू ले के आना खेलेंगे हम होली…”

सोलहा सालकी सांवरी छोरी, जरा शरमाके दौडी।
नजर चुराके, नैन झुकाके, कुछ कुछ ऐसा बोली,

           “ये कौन सा रंग भर आया, मेरा अंग अंग रंग होली।“
            सोलहा सालकी सांवरी छोरी, मस्तीसे खेली होली।

   હિન્દી        

દ્રશ્ય અને શ્રાવ્ય–મને આવી સવાર ગમે…

ડલાસના રેડિયો સ્ટેશન પર સંગીતા ધારિયાના સુમધુર સ્વરમાં પ્રસારિત થયેલ એક રચના.

http://youtu.be/kznSS7gXtbI

 

 

મને આવી સવાર ગમે…ખુશ્બૂ ભરી બહાર ગમે.

મન… ( અછાંદસ )

મન…મન…
સાવ નાજુક કુમળાં છોડ જેવું.
હઠીલાં નાનકડાં બાળ જેવું.
વારંવાર એને સમજાવવું પડે.
ઘડીઘડી એને મનાવવું પડે.
મન….આ મન……
માની જાય, સમજી જાય,
વાળીએ તેમ વળી પણ જાય ને
વળી પાછું અચાનક છટકી જાય.
મર્કટ બની કો’ મદારીની
ડુગડુગી પર નાચવા માંડી જાય.
મનગમતી જગાએ પહોંચી જ જાય,
આપમેળે ગમતું સઘળું કરતું થઈ જાય.
આ મન.. મન…
કોઈનું મન સુદામાના તાંદુલમાં,
કોઈનું ભરસભામાં ચીર પૂરતા સખામાં.
કોઈનું ભીલડીના એંઠા બોરમાં,
તો કોઈનું મન કેવટની નાવમાં..
હં…આજના માનવીનું મન,
ચંદ્ર અને મંગળમાં.
વિધવિધ ટેક્નીકલ રમકડાંમાં!
પણ એ કદી કેમ નથી પહોંચતું
એકબીજાંના મન સુધી !!!
કેમ?! કેમ!!!
આ મન…મન…..

पच्चीस साल पुरानी गलीमें…

पच्चीस साल पुरानी गलीमें,
फिर एक बार गुझर रही थी
मनकी गुफामें जैसे एक बारात;
यादोंकी बारात जा रही थी।
वो ही चौराहें,वो ही राहें, वो ही हवायें,
पच्चीस साल पुरानी गलीमें…..
कुछ नहीं बदला था वही;
हां, सिर्फ मैं नहीं थी कहीं !
फिर भी न जाने क्यूं,
लग रहा था ऐसे,
जैसे,
कल शाम ही तो
मैं यहीं थी!!!!!
पच्चीस साल पुरानी गलीमें…..
हमेशा मैं वहीं थी..फिर भी नहीं थी,
क्यूं की मैं कहीं ऑर थी..
पच्चीस साल पुरानी गलीमें,
फिर एक बार गुझर रही थी

मनकी गुफामें जैसे एक बारात;
यादोंकी बारात जा रही थी।

पहेली बार

कविताकी ये शाममें सुनहरी एक बात लाई हूं;
सितारोंसे सजी रातका आस्मान लाई हूं.

न सूर है, न साज है, और सरगम भी नही है;
पर झूम उठे हवायें ऐसी तान लाई हूं.

देखुं कहीं पतझड यहीं, ओर है झिलमील कहीं;
पर दिलके आंगनमें खीला एक हराभरा पान लाई हूं.

पुष्प है दो लब्झके ओर पंख है कुछ प्यारकी,
साथमें स्नेहसे रचा सच्चा सच्चा हार लाई हूं.

न सोचना ये पलकोंसे अश्क बह गये,
आपकी तारीफमें भीगी भीगी-सी आंख लाई हूं.

मनसे नमन है,होठ है खामोश बस..
पर गान मखमली यहां पहेली बार लाई हूं.

पहेली बार लाई हूं….