पहेली बार

कविताकी ये शाममें सुनहरी एक बात लाई हूं;
सितारोंसे सजी रातका आस्मान लाई हूं.

न सूर है, न साज है, और सरगम भी नही है;
पर झूम उठे हवायें ऐसी तान लाई हूं.

देखुं कहीं पतझड यहीं, ओर है झिलमील कहीं;
पर दिलके आंगनमें खीला एक हराभरा पान लाई हूं.

पुष्प है दो लब्झके ओर पंख है कुछ प्यारकी,
साथमें स्नेहसे रचा सच्चा सच्चा हार लाई हूं.

न सोचना ये पलकोंसे अश्क बह गये,
आपकी तारीफमें भीगी भीगी-सी आंख लाई हूं.

मनसे नमन है,होठ है खामोश बस..
पर गान मखमली यहां पहेली बार लाई हूं.

पहेली बार लाई हूं….

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